कब तक रोकोगें ।
हवाओं सी गुनगुनाती जिंदगी हैं मैरी,
समुद्र से गहरी ज्ञान धारा है मेरी ।
वृक्ष से कोमल छाया है मेरी ।
सूर्य से अधिक प्रकाश हैं जिंदगी में मेरी।
कैसे रोकोगें और कब तक रोकोगें ।


अपनी जिंदगी का मैं ही सूर्य हूँ और मैं
ही चाँद।
मैं वो जमीन हूं जिसे नहीं चाहीए खाद ।
मैंने अपने कलम से दुनियां के युद्धों को
जीता हूँ ।
अब बताओ कैसे रोके और कब तक रोकोगें।
                     by:-Amrit Kumar

           Inspired by:AMITABH