परछाई से डर लगने लगा है
जिंदगी की जंग मई तभी हर गया। जब मै डरना सीखा था।
बचपन में माँ बाप ने पाल पोशकर बड़ा किया।
ये बोलकर बाहार मत जाओ ,वो आ जायेगा ,
मुझे डरावनी कहानियो से डरा दिया।
दिल मेरा खुद को आईने में देखने डरने लगा है।
अब तो पीछे मुड़कर देखने को जी नहीं सकता
साहबा।
क्यूकि अब अपनी परछाई से भी डर लगने लगा है।
गुमसूदा बन्द कमरे में घंटों बैठे रहता हूं।
इस डर को मिटाए भी न मीटा पाता हूं।
हमारी मुलायम नज़रें समाज की डरावनी
तस्वीर को देखकर पलक के पीछे छुप जाती है
बुराइयों को लिखते-लिखते मेरी कलम काप
जाती हैं।
कलतक डर लगता था इन बुराइयों से
आज तो अपनी परछाई से डर लगने लगा है।
साहबा।
क्यूकि अब अपनी परछाई से भी डर लगने लगा है।
गुमसूदा बन्द कमरे में घंटों बैठे रहता हूं।
इस डर को मिटाए भी न मीटा पाता हूं।
हमारी मुलायम नज़रें समाज की डरावनी
तस्वीर को देखकर पलक के पीछे छुप जाती है
बुराइयों को लिखते-लिखते मेरी कलम काप
जाती हैं।
कलतक डर लगता था इन बुराइयों से
आज तो अपनी परछाई से डर लगने लगा है।


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